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भादो अमावस्या: अघोर व्रत अनुष्ठान अघोर अमावस्या एक अनुष्ठानिक पर्व….

भादो अर्थात् भाद्र मास एक तरह से त्यौहारों का महीना है। गणेश चतुर्थी, स्वतंत्रता दिवस, जन्माष्टमी, अघोर चतुर्दशी, पोला अमावस्या, हरतालिका तीज, राधा अष्टमी, श्राद्ध पूर्णिमा इसमें शामिल हैं। इस तरह भाद्र मास ईश्वरीय आराधना के लिए एक महत्वपूर्ण माह है, और बिना श्रद्धापूर्वक आराधना के किसी त्यौहार की सार्थकता नहीं है।


भाद्र मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को अघोर चतुर्दशी भी कहा जाता है। एवं इस चतुर्दशी को बारहों महीने की समस्त चतुर्दशी में सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। एवं समस्त अमावस्याओं में पोला अमावस्या को बहुत ही महत्वपूर्ण तिथि के रूप में सनातन संस्कृति में स्वीकार किया गया है। यही अमावस्या अघोर अमावस्या भी है। इसी अघोर अमावस्या तिथि को अघोर पंथ के बड़े बड़े गुरुओं के द्वारा विशिष्ट कार्य सम्पादित किए जाते हैं। जैसा कि विदित हो कि अघोर पंथ पूर्णत: देवी आराधना पर ही आधारित है और अघोर पंथ में देवी की आराधना शक्ति के रूप में की जाती है। अघोर पंथ में मूल गुरु के रूप में महादेव शंकर जी सर्वमान्य स्वीकार्य हैं और वे ही त्रिगुण शक्ति के स्वामी भी हैं। उनके त्रिगुण शक्ति का प्रतीक महादेव के द्वारा धारण किया गया त्रिशूल है और देवी शक्ति पूरी सृष्टि में त्रिगुण (सत्व, रज, तम) विस्तारित है। इस तरह महादेव शंकर जी द्वारा धारित त्रिशूल ही देवी शक्ति का प्रतीक है और यह ही अघोर शक्ति है।

राणी सती दादी की पूजा –
राजस्थान के झुंझणू में राणी सती दादी जी का स्थल है एवं राणी सती दादी जी की पूजा मात्र उस क्षेत्र के वासियों के द्वारा ही नहीं अपितु भारतवर्ष के भिन्न- भिन्न क्षेत्रों के वासियों द्वारा भी की जाती है। राणी सती दादी का प्रतीक स्वरूप कोई विग्रह (मूर्ति) ना होकर त्रिशूल में ही देवी जी का स्वरूप श्रृंगार है। राणी सती दादी जी की विशेष पूजा आराधना का जो दिवस है वह भी अघोर चतुर्दशी और अघोर अमावस्या ही है जिसे पोला अमावस्या कहा जाता है। इससे भी ज्ञात होता है कि त्रिगुण शक्ति की विशेष पूजा अनुष्ठान की विशिष्ट तिथि अघोर अमावस्या अर्थात् पोला अमावस्या ही है।

कैसे करें अनुष्ठान :🙏

अघोर चतुर्दशी की संध्या 4 बजे इस प्रार्थना के साथ करें-

हे नाथ जी ये जग आपका, सारे काज आपके, आपही हैं कर्ता-कारण, कृपा आपकी बनी रहे, शुरु हो शुभ सारे काम।
मंत्र – ऊँ श्री नाथ प्रचण्ड रुपाय नम:
आदेश सतगुरुदेव का
व्रत शुरु करें-
इस व्रत में संध्या 4 बजे के बाद भोजन ग्रहण ना करें और रात्रि 10 बजे ध्यान व जाप करें। जाप के लिए उपरोक्त मंत्र (ऊँ श्रीनाथ प्रचण्ड रुपाय नम:) का ज्यादा से मानसिक जाप करें व हवन करें। इस तरह प्रतिदिन चतुर्दशी, अमावस्या, एकम, द्वितीया व तीज तक आराधना करें। उसके उपरांत चतुर्थी तिथि जिस दिन गणपति विराजित किए जाते हैं, नाथजी को भोजन व जल का भोग अर्पित कर जरूरतमंदों को भोजन व जल का प्रसाद का वितरण कर भोजन ग्रहण करें।
इस तरह सहजता और सरलता पूर्वक इस विशिष्ट अनुष्ठान को संपादित किया जा सकता है। इसी कारण इसे अघोर अमावस्या अनुष्ठान कहा जाता है, क्योंकि अघोर का वास्तविक अर्थ ही है सहज व सरल। इस विशिष्ट अनुष्ठान को करने से हमारा जीवन जटिलताओं से मुक्त हो सरल व सहज होते जाता है। जीवन की कर्मबंधन युक्त बाधाएं स्वत: समाप्त होती जाती है व साधक भुक्ती व मुक्ती को प्राप्त होता है।

       

21 अगस्त से गुरूवार चतुर्दशी तिथी से पुजा आरंभ है।

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