
धमतरी :सदर बाजार बना ‘वीआईपी पार्किंग ज़ोन’, ट्रैफिक पुलिस बनी मूक दर्शक
वीआईपी गाड़ी है हमारी… जाम तुम्हारी समस्या है!




धमतरी (छत्तीसगढ़)।“जहां मन किया वहीं गाड़ी खड़ी, क्योंकि गाड़ी हमारी है और हम… वीआईपी!” — यही अघोषित नियम इन दिनों धमतरी शहर के सदर बाजार में पूरी शिद्दत से लागू है। यहां जाम कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि रोज़ का तयशुदा कार्यक्रम बन चुका है। खासकर तब, जब किसी “खास” की चारपहिया गाड़ी खरीदारी के नाम पर ठीक दुकान के सामने आकर सड़क को अपनी निजी संपत्ति घोषित कर देती है।सदर बाजार का मार्ग पहले से ही इतना संकरा है कि एक चारपहिया निकली तो दूसरा आ जाए, बस फिर सड़क नहीं—कुश्ती का अखाड़ा बन जाता है। ऊपर से वीआईपी वाहन अगर बीच सड़क खड़ा हो जाए, तो जाम होना नहीं, जाम का महाकाव्य रचा जाना तय है।
वीआईपी बनाम वर्दी: रुतबे की जीत, कानून की हार
सबसे ज़्यादा बेबस दिखती है ट्रैफिक पुलिस। जवान माइक से विनती करते हैं, सिटी बजाते हैं—पर जैसे ही “गाड़ी साहब की है” वाला वाक्य हवा में तैरता है, कानून घुटने टेक देता है। कई बार तो गाड़ी में ड्राइवर भी नहीं, मालिक शॉपिंग में मस्त और सड़क पर आम नागरिक पसीने में तरबतर।
नतीजा—ट्रैफिक पुलिस एक बार निवेदन कर आगे बढ़ जाती है, क्योंकि सामने “ओहदे” का कवच होता है। साहब कोई भी हो सकता है—इसी हो सकता है के डर से कार्रवाई नहीं हो पाती।
सदर में रोज़ का तमाशा, जनता बने बंधक
चाहे लोकल गाड़ी हो या बाहर की, सदर बाजार में पार्किंग का मतलब सड़क पर कब्ज़ा। जाम लगता है, हॉर्न बजते हैं, एंबुलेंस फंसती है, स्कूली बच्चे देर से पहुंचते हैं—लेकिन वीआईपी खरीदारी पूरी करके ऐसे निकलते हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं। सड़क संकरी है, विकल्प नहीं है, और संवेदनशीलता तो मानो कहीं खो चुकी है।
सख्ती नहीं तो अराजकता तय
ऐसे हालात में ट्रैफिक पुलिस को अब ‘निवेदन मोड’ से निकलकर *कानून मोड* में आना होगा। जब तक बड़े ओहदे और बड़ी गाड़ियों पर भी सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक नियम सिर्फ आम आदमी के लिए ही रहेंगे। कानून का डर अगर सबके लिए बराबर नहीं, तो व्यवस्था सिर्फ दिखावा है।
पार्किंग की व्यवस्था नहीं, तो जाम की विरासत
सदर मार्ग शहर का सबसे भीड़भाड़ वाला इलाका है—गोलबाजार, सब्जी मंडी, कपड़ा व्यापारी, सोना-चांदी की दुकानें—हर वर्ग की दुकान यहीं। चारपहिया वाहनों की भरमार, खासकर शहर के बाहर से आने वालों की। लोग गाड़ी कहीं भी खड़ी कर देते हैं और गायब हो जाते हैं।पुलिस तब फंसती है जब जाम लग जाता है और गाड़ी का मालिक खरीदारी में व्यस्त रहता है।निगम के पास समाधान है—मकई चौक के पास दो स्थानों पर पार्किंग की व्यवस्था पहले से मौजूद है, लेकिन “थोड़ा पैदल चलना पड़ेगा” — यही बात लोगों को नागवार गुजरती है। नतीजा, सड़क पर पार्किंग और शहर जाम।
VIP संस्कृति पर ब्रेक जरूरी
अगर धमतरी को जाम से मुक्ति चाहिए, तो वीआईपी गाड़ियों की मनमानी पर सबसे पहले ब्रेक लगाना होगा। पार्किंग की स्पष्ट व्यवस्था, सख्त कार्रवाई और बिना भेदभाव कानून—यही एकमात्र रास्ता है। वरना सदर बाजार यूं ही “खरीदारी कम, जाम ज्यादा” का स्थायी स्मारक बना रहेगा।





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