
सागौन के सौदागर : जंगल की रात और छापेमारी की दास्तां
धमतरी ।रात गहरी थी। सीतानदी के जंगलों पर सन्नाटा पसरा हुआ था। हल्की हवा पत्तों को हिला रही थी, जैसे कोई रहस्य अपने भीतर छुपाए हो। मगर उस खामोशी के बीच कुछ लोग चोरी-छिपे अपनी काली कमाई का खेल खेल रहे थे—सागौन की तस्करी।

वन विभाग की टीम को एक मुखबिर से खबर मिली—
“साहब! पास के एक ठिकाने में बेसकीमती सागौन की लकड़ियाँ छिपाई गई हैं। फर्नीचर भी तैयार हो रहा है… रात होते ही सौदा बाहर जाएगा।”
सूचना मिलते ही डीएफओ वरुण जैन की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने अपने अमले को इशारा किया—
“आज रात यही खेल ख़त्म करना है। तैयार रहो, किसी को खबर तक न होनी चाहिए।”
और फिर, अंधेरे को चीरती हुई जीपों का काफिला सीतानदी रिजर्व के भीतर बढ़ चला।
ठिकाने पर दस्तक

जैसे ही टीम ने तस्करों के ठिकाने को घेरा, वहाँ फैली गंध और लकड़ी के ढेर ने सच उगल दिया।
लकड़ियों के ढेर ऐसे लगे थे जैसे जंगल का एक हिस्सा काटकर यहाँ ला पटका गया हो।
बनते-बनते तैयार फर्नीचर, और हर कोने में छिपाए गए तख़्त—सारा सामान लाखों का था।
मगर तभी, जैसे ही दरवाज़े पर दस्तक हुई, अंदर बैठे सौदागर नौ-दो-ग्यारह हो गए।
एक पल में ठिकाना सुनसान, और पीछे बस रह गई सन्नाटे में बिखरी लकड़ियों की खनक।

भागते सौदागर और पीछा करती टीम
वन विभाग की टीम ने पीछा किया।
गश्त के दौरान एक पिकअप गाड़ी को पकड़ा गया, जिसमें सागौन लकड़ी लदी थी।
लेकिन कुछ लोग अंधेरे की ओट लेकर भाग निकले।
डीएफओ वरुण जैन ने गहरी सांस लेते हुए कहा—
“यह तो बस एक शुरुआत है। असली सौदागर अभी फरार हैं। मगर ज्यादा दिन नहीं बचेंगे।”
जंगल का सवाल
लेकिन सवाल वहीं खड़ा रहा—
आख़िर ये कारोबार कब से चल रहा था? इतने बड़े पैमाने पर तस्करी की भनक विभाग को देर से क्यों मिली?
जंगल गवाह है कि लकड़ियाँ दिन-रात कट रही थीं, पर खामोशी की आड़ में किसी ने देखा तक नहीं।
क्या ये तस्कर बरसों से अपनी जड़े जमा चुके थे?
या अब जाकर जंगल ने ही खुद अपने रहस्य खोल दिए?
अधूरा पड़ाव
ठिकाना पकड़ा गया, लकड़ियाँ जब्त हुईं, मगर सागौन के सौदागर अभी भी जंगल की परछाइयों में छिपे हैं।
वन विभाग की जीत अधूरी है।
सीतानदी का जंगल आज भी इंतज़ार कर रहा है उस दिन का—
जब उसके हर कोने से तस्करी का नाम मिट जाएगा।
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