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शिक्षा विभाग का नया दमनकारी आदेश: अब विद्यार्थियों और पालकों द्वारा आवाज़ उठाने पर प्राचार्यो को भुगतना पड़ेगा खामियाज़ा!

बेमेतरा शिक्षा विभाग का दमनकारी आदेश:

अब बच्चों व पालकों के द्वारा आवाज उठाने पर प्राचार्यो को भुगतना पड़ेगा खामियाज़ा!

बेमेतरा |छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले से एक ऐसा आदेश सामने आया है, जिसने पूरे प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। जिला शिक्षा अधिकारी (D.E.O) बेमेतरा द्वारा जारी एक फरमान में कहा गया है कि यदि किसी विद्यालय के छात्र या उनके पालक विद्यालय में शिक्षकों की कमी या अव्यवस्था को लेकर तालाबंदी, धरना, प्रदर्शन या उच्च कार्यालयों का घेराव करते हैं, तो संबंधित प्राचार्य और शिक्षकों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी और उनका वेतन रोक दिया जाएगा।

यह आदेश ना केवल तुगलकी मानसिकता को दर्शाता है, बल्कि यह साफ़ तौर पर लोकतांत्रिक अधिकारों के गला घोंटने की कोशिश है।


प्रश्न यह है – क्या शिक्षकों की नियुक्ति में विफल प्रशासन अपनी नाकामी का ठीकरा अब प्राचार्यों पर फोड़ना चाहता है?

शिक्षा विभाग की विफलता पर पर्दा डालने का शर्मनाक प्रयास

बेमेतरा जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा जिले के सभी विकासखंड शिक्षा अधिकारियों, सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के प्राचार्यों, और आत्मानंद अंग्रेजी व हिंदी माध्यम स्कूलों के प्राचार्यो को जारी पत्र में कहा गया है कि –

कई छात्र, पालक और ग्रामवासी शिक्षक की मांग को लेकर बिना अनुमति प्रदर्शन, तालाबंदी, चक्काजाम कर रहे हैं और सीधे उच्च कार्यालयों में ज्ञापन सौंप रहे हैं – जो “शासकीय कार्य में बाधा” की श्रेणी में आता है। यदि ऐसा होता है तो संबंधित प्राचार्यो पर अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए वेतन रोकने की कार्यवाही की जाएगी।

यह आदेश साफ़ दर्शाता है कि शिक्षा विभाग अब समस्या का समाधान नहीं, बल्कि आवाज़ उठाने वालों को डराने में लगा है।

क्या यह लोकतंत्र है या शासकीय तानाशाही का दौर?

विद्यालय में शिक्षक नहीं होंगे, विषयों की पढ़ाई अधूरी रहेगी, बच्चों का भविष्य अंधेरे में होगा – और जब पालक सवाल उठाएंगे, तो दंड मिलेगा प्राचार्यों और शिक्षकों को?
यह तंत्र अब शिक्षा के मंदिरों में डर और दमन का माहौल बनाना चाहता है।
इस आदेश का लब्बोलुआब यही है – “बोलोगे तो भुगतोगे।”

आत्मानंद स्कूल – कभी शिक्षा का मॉडल, अब प्रशासन की उपेक्षा का शिकार

पूर्ववर्ती सरकार द्वारा खोले गए आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों का उद्देश्य था गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों को उत्कृष्ट अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा देना।
लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद इन स्कूलों की स्थिति बद से बदतर हो चुकी है –

  • शिक्षकों की भारी कमी
  • विज्ञान, गणित जैसे विषयों के शिक्षक नदारद
  • प्रयोगशालाएं और लाइब्रेरी कागज़ों तक सीमित
  • बुनियादी सुविधाओं का अभाव

पहलेजिनआत्मानंद अंग्रेजी मीडियम स्कूलों मेंएडमिशन के लिए लाइन लगी रहती थीउन्हें आत्मानंद अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में अब विद्यार्थियों के पालक टीसी निकालने के लिए लाइन लग रहे हैं ।

क्या इस स्थिति के लिए भी प्राचार्य और शिक्षक ही दोषी हैं? या फिर शासन और शिक्षा विभाग अपनी विफलताओं से भाग रहे हैं?

33,000 शिक्षक भर्ती का झूठा वादा – बेरोजगारों के साथ विश्वासघात

वर्तमान सरकार ने सत्ता में आने से पहले चुनाव के दौरान 33000 शिक्षकों की भर्ती का वादा किया था। आज राज्य सरकार को बने 1.5 वर्ष से अधिक हो चुके हैं , ना तो विज्ञापन निकले, ना नियुक्तियाँ हुईं।
शिक्षित बेरोज़गार आज भी दर-दर भटक रहे हैं, और जो शिक्षक कार्यरत हैं – उन्हें डराने धमकाने के आदेश जारी हो रहे हैं।
यह न केवल शिक्षा तंत्र का मज़ाक है, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है।

यह आदेश किसी एक अधिकारी की मनमानी नहीं – शासन की रणनीति का हिस्सा है

यह सोचना भी एक भूल होगी कि जिला शिक्षा अधिकारी ने यह आदेश अपनी मर्जी से जारी किया है।
यह आदेश शासन और प्रशासन की उस रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है, जिसके तहत आवाज़ उठाने वालों को चुप करवाया जाए।
प्रशासन यह मान बैठा है कि शिक्षक और पालक अब केवल “आज्ञाकारी प्राणी” बनकर रहें – चाहे स्कूलों में कुछ भी हो रहा हो, सवाल ना पूछें, मांग ना करें।

अब तय होगा कि लोकतंत्र जिंदा है या तानाशाही हावी हो चुकी है

यह आदेश केवल बेमेतरा जिले का मामला नहीं है – यह छत्तीसगढ़ की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था पर सीधा हमला है।

  • क्या प्राचार्य शिक्षक अब बच्चों की समस्याओं पर भी चुप रहेंगे?
  • क्या पालकों को अपने बच्चों के लिए सवाल उठाने का भी अधिकार नहीं रहा?
  • क्या सरकार खुद को असहाय दिखाकर शिक्षक समाज को बलि का बकरा बना रही है?

अब जनता को तय करना है – इस तुगलकी आदेश का प्रतिकार होगा या तानाशाही चुपचाप स्वीकार की जाएगी।

📌 निष्कर्ष:
यह आदेश न केवल शिक्षा की आत्मा के खिलाफ है, बल्कि एक पूरे समाज को चुप कराने की साजिश है। यदि आज चुप रहे, तो कल बोलने का हक भी छिन जाएगा।
शिक्षा केवल किताबों से नहीं, बल्कि सवालों से भी चलती है – और जब सवाल ही अपराध बना दिए जाएं, तो समझ जाइए व्यवस्था सड़ चुकी है।

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