
संपादकीय : जब सत्ता चुप और स्वास्थ्य तंत्र लाचार – तो जनता किससे करे उम्मीद?
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छुरा अस्पताल में हुई 14 वर्षीय जिज्ञासा की मौत कोई साधारण हादसा नहीं है। यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था किस हद तक चरमराई हुई है। और सबसे शर्मनाक यह है कि अब तक न तो जिला प्रशासन और न ही स्वास्थ्य विभाग ने कोई आधिकारिक बयान तक देना जरूरी समझा। सवाल उठता है – क्या आम जनता की जिंदगी इतनी सस्ती हो चुकी है कि मौत भी अब फाइलों में दर्ज होकर रह जाए?
यह बच्ची किसी आम परिवार की नहीं थी, बल्कि एक प्रतिष्ठित अखबार के संपादक की पुत्री थी। यानी उस परिवार की, जो अपनी कलम से सत्ता को आईना दिखाता है। यदि पत्रकार की बेटी तक अस्पताल की लापरवाही की शिकार होकर मौत के मुंह में समा सकती है, तो आम गरीब जनता का हाल क्या होता होगा, यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
सत्ता और स्वास्थ्य तंत्र की मिली-जुली चुप्पी ही इस मौत का सबसे बड़ा अपराध है।
- क्यों एक प्रशिक्षु डॉक्टर को रात की ड्यूटी पर गंभीर मरीज की जिम्मेदारी दी गई?
- क्यों ओवरडोज़ दवा देकर मासूम की जान दाँव पर लगा दी गई?
- क्यों अलग-अलग डॉक्टरों के विरोधाभासी बयान सामने आए?
- और क्यों अब तक दोषियों पर कार्रवाई तो दूर, जांच तक शुरू नहीं हुई?
राजनीतिक तौर पर यह मामला सरकार की जवाबदेही पर सीधा सवाल है। सत्ता में बैठे नेता चुनाव के वक्त स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन जब अस्पतालों में मरीजों की जान दाँव पर लगाई जाती है, तब वही नेता चुप्पी साध लेते हैं। छुरा की यह घटना इसका ताज़ा उदाहरण है।
आज जरूरत है कि सत्ता दल और विपक्ष – दोनों इस मामले पर खुलकर बोलें। सिर्फ बयानबाज़ी नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की माँग हो। जनता को यह संदेश मिलना चाहिए कि मौत पर राजनीति नहीं, इंसाफ होगा।
जिज्ञासा की मौत ने साफ कर दिया है कि गरियाबंद जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था लहूलुहान है और सत्ता की संवेदनशीलता मृतप्राय। अगर सरकार अब भी नहीं जागी तो यह चुप्पी आने वाले दिनों में और मासूम जिंदगियों को निगल जाएगी। यह मामला सिर्फ एक बच्ची की मौत का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनता के हक की मौत का प्रतीक है।
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