
लापता विधायक’ वाला पोस्टर: जनता की पीड़ा या राजनीतिक व्यंग्य? विधायक ने कहा अस्वस्थता के चलते कार्यालय में हो रही है जनता से मुलाकात

महासमुंद, छत्तीसगढ़।
विधानसभा क्षेत्र महासमुंद में इन दिनों दीवारों पर एक अनोखा नज़ारा देखने को मिल रहा है—एक विधायक की “गुमशुदगी” को लेकर चस्पा किए गए पोस्टर। तुमगांव, पटेवा, सिरपुर सहित आसपास की जनता के द्वारा इनको खोजे जाने की बात उक्त लगे पोस्टर में की गई है, जो खल्लारी क्षेत्र में चिपका हुआ मिला जिसने न केवल जनचर्चा को गर्मा दिया है, बल्कि राजनीतिक हलकों में भी हलचल मचा दी है।
इन पोस्टरों में क्षेत्रीय विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा की तस्वीर के साथ व्यंग्यात्मक भाषा में उन्हें “लापता” बताया गया है। पोस्टर में दावा किया गया है कि विधायक से संपर्क की लगातार कोशिशें की जा रही हैं, लेकिन जनता को कोई जवाब नहीं मिल रहा। इतना ही नहीं, पोस्टर में यह भी व्यंग्य किया गया है—”कहीं करणी कृपा के प्रबंधक ने अपने यहां छिपाकर तो नहीं रखा है?” यह संकेत क्षेत्र की एक जानी-मानी संस्था या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की ओर इशारा करता है, जिससे राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हो गई हैं।
जनता की नाराजगी और असंतोष की झलक
पोस्टर चिपकाने वाले लोग—जिनमें किसान, बेरोजगार युवा और महिलाएं शामिल हैं—का कहना है कि क्षेत्र में कृषि संकट, रोजगार की कमी, महिला सुरक्षा, और सरकारी योजनाओं में अनियमितताएं जैसी समस्याएं गंभीर होती जा रही हैं। लेकिन विधायक की अनुपस्थिति के चलते उनकी आवाज़ न तो कहीं सुनी जा रही है और न ही समाधान की दिशा में कोई ठोस पहल दिख रही है।
ग्रामीणों का आरोप है कि वे लगातार अपने प्रतिनिधि तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनके गांव-गांव भटकने के बाद भी कहीं कोई ठोस संवाद नहीं हो पा रहा है।
विधायक का जवाब: “मैं जनता के संपर्क में हूं, समस्या स्वास्थ्य की है”
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा,
“मैं लगातार अपने क्षेत्र की जनता से संपर्क में हूं। अभी मैं इस अस्वस्थता के बावजूद विधानसभा के सत्र में। शामिल हुआ, साथ ही साथ मेरे निवास और कार्यालय में भी क्षेत्रवासी नियमित रूप से मिलने आ रहे हैं।
जिन्होंने मेरे खिलाफ पोस्टर लगाए हैं, वे खुद ही क्षेत्रीय गतिविधियों से लापता हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि उनकी तबीयत पिछले डेढ़ माह से ठीक नहीं थी।
“मेरी रीढ़ की हड्डी के एल-5 और एस-7 वर्टिब्रा में दिक्कत के चलते डॉक्टर ने मुझे आराम की सलाह दी थी। बावजूद इसके, मैंने अपने कर्तव्यों से खुद को अलग नहीं किया और लोगों से यथासंभव मिलते रहा।”
साथ ही विधायक ने इस प्रकरण को राजनीतिक चश्मे से देखने की बात करते हुए कहा कि यह विपक्ष द्वारा जनता को भ्रमित करने की एक कोशिश है।
“प्रदेश में मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में सुशासन चल रहा है। इसलिए विपक्ष खुद से ही लापता होता जा रहा है,” उन्होंने कहा।
राजनीतिक संदेश या जनाक्रोश?
विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के पोस्टर केवल राजनीतिक स्टंट नहीं हैं, बल्कि वे एक गहरे जन-संवेदनात्मक असंतोष की ओर भी संकेत करते हैं। चुनावी वादों और प्रतिनिधित्व के बीच की खाई जब ज्यादा चौड़ी हो जाती है, तब जनता इन व्यंग्यात्मक माध्यमों से अपने गुस्से और हताशा को जाहिर करती है।
सार्वजनिक मंचों से सवाल
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है — क्या चुने हुए जनप्रतिनिधि केवल चुनाव के समय ही जनता के बीच नजर आएंगे?
क्या स्वास्थ्य या व्यक्तिगत व्यस्तता के नाम पर जनसमस्याओं से दूरी बनाना उचित है?
और क्या जनता को अपनी बात कहने के लिए अब पोस्टर का ही सहारा लेना पड़ेगा?





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