C.G.

राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र वन अधिकार से बेदखल, गरियाबंद कलेक्टर से भी मांगा जवाब।

गरियाबंद… छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने केंद्रीय वन सचिव, राज्य के मुख्य सचिव के साथ 17 जिलों के कलेक्टर को नोटिस जारी किया है ये नोटिस चीफ जस्टिस अरुण कुमार गोस्वामी की डिवीजन बेंच ने वन अभ्यारण्य और राष्ट्रीय उद्यानों जैसे इलाकों से राष्ट्रीपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले आदिवासियों को बेदखल करने के खिलाफ जारी किया है।
जिसमें उदंती अभ्यारण्य गरियाबंद क्षेत्र भी शामिल है जिसके संबंध में गरियाबंद कलेक्टर को भी नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। आजादी के बाद डॉ राजेंद्र प्रसाद जब राष्ट्रपति बने तो वर्ष 1952 में छत्तीसगढ़ आए और वह उन्हीं आदिवासियों के बीच पहुंचे और उन्हें दत्तक पुत्र बनाने की घोषणा की।

अखिल भारतीय जंगल मंच के संयोजक देवजीत नंदी ने अधिवक्ता रजनी सोरेन के माध्यम से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है जिसमें कहा गया है कि समुदाय के लोगों का वनों के संरक्षण, संवर्धन व पर्यावरण जलवायु परिवर्तन को बचाए रखने के लिए विशेष योगदान है केंद्र और राज्य शासन ने भु उन्हें वन अधिकार के लिए पात्र माना है 2006 में वन अधिकारों की मान्यता अधिनियम एवं संशोधित अधिनियम 2012 की धारा 3 (1) (E) के तहत हेबिटेट राइट से दिए हैं। याचिका में बताया गया है कि आदिवासी समुदाय आदिकाल से ही वनों में निवास करते आ रहे हैं वनों पर ही उनकी जीविका निर्भर है इसके साथ ही वनों के संरक्षण, जंगल वन्य प्राणियों और विशेष संरक्षित खाद्य पदार्थों, जीवों के साथ रह वास में रहने से जंगल के इकोसिस्टम की जानकारी भी समुदाय के लोग रखते हैं इसके बाद भी इन विशेष संरक्षित समुदाय जिन्हें राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र भी कहा जाता है इन्हें वन्य प्राणियों के संरक्षण के नाम पर बेदखल कर उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है।
माननीय उच्च न्यायालय के इस फैसले का एनएसयूआई अध्यक्ष प्रवीण बम्बोड़े ने स्वागत करते हुए अखिल भारतीय जंगल मंच का आभार व्यक्त करते हुए इस फैसले को राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले इन आदिवासियों को उनके हितों में बताते हुए उनके अधिकार मिलने से इस फैसले को एक ऐतिहासिक फैसला बताया है।

YOUTUBE
Back to top button