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कोमाखान विशेष : राजमहल के भग्नावशेष में नजर आते हैं पारंपरिक त्यौहार धूमधाम से मनाया जाने के प्रमाण

डॉ. विजय शर्मा की कलम से

कोमाखान।छतीसगढ़ के पारम्परिक त्योहारों में परम्परा का गजब समन्वय है, देश भर में होली दिवाली सहित अनेक राष्ट्रीय पर्व तो मनाते ही है किंतु माता पहुंचनी, पोरा, तीजा, इतवारी, नवाखाई, बढोना, छेवर और छेर छेरा ऐसा पर्व है जिसे अपने स्तर और तरीके से मनाया जाता है।
छेर छेरा का त्योहार पूस पूर्णिमा को मनाया जाता है , शास्त्रीय परम्परा के अनुसार इस दिन प्रातः स्नान व सूर्य को अर्ध देने को पुण्य का कार्य माना जाता है। किन्तु पूस महीने में शादी व्याह करने देखने को वर्जित किया जाता है। रिस्तेदारी व आने जाने में पाबंदी भी होती है।कहावत भी है- आये पूस , गये – खुस खुस यहाँ खुस का तात्पर्य जल्दी से है, ऐसी स्थिति में छत्तीसगढ़ एवं तटवर्ती उड़ीसा में छेर छेरा त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है।

राज महल के भग्नावशेष देते हैं प्रमाण

सुअरमार जमीदारी में इसका प्रमाण 17 वी शताब्दी के अंत मे बने कोमाखान राजमहल में दिखाई देता है, महल के शिखर के दाएं में गारे की पेस्ट से बनी बेहद उम्दा कलाकृति जिसमे एक राज महिला सिर में टोकरी लिए दान मुद्रा में खड़ी है वही बांई ओर एक राज पुरुष बोरा लिए याचक की मुद्रा में, स्थापित कला कृति तत्कालीन सामाजिक परिवेश को इंगित करता है। लगता है 17 वी सदी में छेर – छेरा का त्योहार गरीबी अमीरी की हैसियत बताने वाला आध्यत्मिक पर्व दान देने और दान लेने की परंपरा को सामाजिक न्याय ,समरसता के रूप में देखा जा सकता है। इस त्योहार की खास बात यह है कि इस दिन किसी देवी या देवता की पूजा नही होती, अमूमन हर पर्व में पूजा का महत्व है पर इस दिन सभी जाति धर्म के पुरुष लोग सुबह से ही टोकनी ,थैला लेकर घर घर मांगने निकल पड़तें है। महिलाएँ नहा धोकर अपने अपने घर के दरवाजे पर टोकनी में धान,कोदो, कुटकी ले कर आने वाले हर याचक के झोली में मुट्ठी भर अनाज डालते हैं, गांव का हर पुरुष याचक व महिला दानी के रूप में प्रस्तुत होती है,ऐसे नैतिक शिक्षा का आदर्श कही और सुलभ शायद हो। वर्तमान में मांगने के आधुनिक तरीको का इस्तेमाल गाजे बाजे वाद्य यंत्रो के साथ समूह में मांगने व मांगे गए धन राशि को किसी पुण्य विशिष्ट कार्य नियोजन के लिए किए जाते। इससे कई ग्रामों में आनज कोठी बने जो आगे चल कर स्वतन्त्रता संग्राम के प्रणेयता ठा प्यारेलाल ने सहकारी आंदोलन का हिस्सा बना । छेर छेरा का आदर्श वाक्य – छेर छेरा माई कोठी के धान हेर हेरा अर्थात मुक्त हस्त से दान करें ,अपने मूल जमा पूंजी माई कोठी याने बिना खोट के दान के महत्व को बताया गया है।
मांगे गए मिश्रित अनाज का खिचड़ी या भाप से बनने वाले माडा रोटी जिसके अंदर गुड़ तिल ,खोवा से स्वादिष्ट मिश्रण को नए अनाज के आटे के बीच भरकर बिना तेल से भाप विधि द्वारा पारम्परिक पकवान इस पर्व का मात्र व्यंजन है, वर्तमान में लोग अपने पसंद का सात्विक या निमिष व्यंजन परम्परा में तब्दील हो रही है।
इस पर्व में धर्म से आगे आध्यात्मिक संस्कार संस्कृति के समन्वय में कर्म को आगे रखा है। दान की महत्ता उसके निष्पादन और सर्वभौमिकता के आदर्श आसानी से जन समुदाय में स्वीकार योग्य बनाया है। कर्म को सर्वश्रेष्ठ की भूमिका में खड़ा किया गया।
आज कोमाखान राजमहल के कँगूरे की शिल्पकला हमारी संस्कृति की वैभवशाली इतिहास और परम्परा की याद दिलाता है।

डॉ.भास्कर राव पांढरे

डॉ.भास्कर राव पांढरे वर्ष 2010 से पत्रकारिता जगत से जुड़े हुए हैं । इन्होंने विभिन्न समाचार पत्रों में सह संपादक के पद पर अपने दायित्वों का व निर्वहन किया है ।2023 की विधानसभा चुनाव के दौरान छत्तीसगढ़ के विभिन्न विधानसभाओं में जनता का अभिमत जानने के लिएजननायक कार्यक्रम लेकरपहुंचे थे , जो विधानसभा चुनाव के दौरान बहुत लोकप्रिय हुआ था । वर्तमान में यह The Howker News के प्रधान संपादक के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
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