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धमतरी में ‘20-20’ का बुखार या सट्टे का कारोबार? लाखों का खेल, पर्दे के पीछे कौन असली सौदागर!

धमतरी में ‘20-20’ का बुखार या सट्टे का कारोबार? लाखों का खेल, पर्दे के पीछे कौन असली सौदागर!

धमतरी।
टी-20 वर्ल्ड कप का रोमांच जैसे ही टीवी स्क्रीन पर चढ़ता है, धमतरी में कुछ लोगों का “व्यापार” भी तेजी से रन बनाने लगता है। बल्ले से निकलती हर चौका-छक्का की आवाज के साथ शहर में लाखों रुपए का सट्टा दांव पर लग रहा है। सवाल वही पुराना—आखिर इस खेल का असली सौदागर कौन है?

क्रिकेट शुरू होते ही शहर में सट्टा खाईवालों की “इनिंग” भी शुरू हो जाती है। पुलिस भले ही दावा करे कि सट्टेबाजों में खौफ है, लेकिन हकीकत यह है कि खेल अब भी “लुका-छिपी” अंदाज में जारी है। चर्चा यह भी है कि जब तक “चढ़ावा” नियमित चलता रहता है, तब तक सब कुछ सामान्य रहता है। और जैसे ही इस प्रवाह में कमी आती है, कार्रवाई की गूंज सुनाई देने लगती है। फिर कुछ दिनों की सख्ती के बाद मामला शांत… और खेल फिर से चालू।

हर गेंद पर हजारों-लाखों का दांव

अब सट्टा केवल मैच जीत-हार तक सीमित नहीं।
हर बॉल पर दांव—चौका, छक्का, विकेट, रन आउट…
मोबाइल फोन और लैपटॉप इस खेल के असली हथियार बन चुके हैं। शहर के कुछ कोनों में बैठकर या घरों में छिपकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए हजारों से लेकर लाखों रुपए तक का खेल चल रहा है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में सट्टेबाजी भी “अपग्रेड” हो चुकी है।

रसूखदार परिवारों के युवाओं की बढ़ती दिलचस्पी

चौंकाने वाली बात यह है कि इस खेल में कथित तौर पर रसूखदार परिवारों के युवाओं की भागीदारी ज्यादा देखी जा रही है। वजह साफ है—हार का जोखिम उठाने की क्षमता। बड़ी रकम हारने के बाद भी संभल जाना उनके लिए आसान होता है।
लेकिन अगर यही दांव कोई मध्यमवर्गीय युवक लगा बैठे और हार जाए, तो उसका घर-परिवार संकट में पड़ सकता है। कई बार उधारी लेकर दांव लगाने की नौबत आती है, और हार के बाद वसूली का दबाव अलग।

पुलिस की सख्ती या औपचारिकता?

शहर में यह भी चर्चा है कि पुलिस को सब जानकारी रहती है, पर कार्रवाई का समय और तरीका अलग होता है। कभी-कभार छापेमारी, कुछ गिरफ्तारी और फिर सन्नाटा। लेकिन क्या इससे सट्टे का नेटवर्क खत्म हो जाता है? या फिर यह “मैच फिक्सिंग” की तरह कुछ दिनों का नाटक भर है?
यह सवाल आम लोगों के मन में लगातार घूम रहा है।

युवाओं का भविष्य दांव पर

क्रिकेट का रोमांच खेल तक सीमित रहे तो बेहतर है, लेकिन जब यह लालच का माध्यम बन जाए तो समाज के लिए खतरा बन जाता है। सट्टेबाजी का यह जाल युवाओं को आसान कमाई के भ्रम में फंसा रहा है।
जरूरत है सख्त और पारदर्शी कार्रवाई की, ताकि खेल का मजा खेल तक रहे और शहर की साख दांव पर न लगे।

अब देखना यह है कि धमतरी में “सट्टे की इनिंग” कब तक चलती है और इस खेल का असली सौदागर आखिर कब बेनकाब होता है।

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